इस संजीदगी से बहके है हम... रातों से भी अब होती है बात, नित घुलती है आपकी याद... ये रात भी कितनी पागल है, पल पल जोड़े है कैसे ख्याल..
मंशा तो मेरी है तुमसे ही सजती, फिर न जाने क्यों है ऐसे हालात... सांचों में भी मूरत नही मिलती, इतनी हसीन है सूरत दिखती... इससंजीदगीसेमैंनेचाहा, अंतर्मनमेंहैबसाक्यूँपाया... इस कशिश को मैंने अपना बनाया, बिन तेरे मै क्यों जी न पाया...